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दार्शनिक

काल

काल

हर कतरा कतरा जीने को मुझे गम के आंसू पीने दो ...
यूं लम्हा लम्हा जीने को एक जाम मुझे और पीने दो ...

हर महफिल महफिल हंसने को मुझे तनहाई में रोने दो ...
यूं जिंदा जिंदा दिखने को मुझे कभी काल से मिलने दो ...

हर साहिल साहिल मिलने को मुझे दरिया से सागर बनने दो ...
यूं गगन गगन में उड़ने को मेरे प्राण पखेरू उड़ने दो ...

-अंकित

जगह

जगह

पलक आंख की झपकती है, आहट जगह बना रही है ...
ख्वाहिशों कि बस्ती है,हकीकत जगह बना रही है ...

दीवानों की मस्ती है, मेहनत जगह बना रही है ...
हर अहसास की हस्ती है, मुहब्बत जगह बना रही है ...

कीमत बहुत जान की सस्ती है, जन्नत जगह बना रही है ...
छोटी जीवन की कश्ती है, मुस्कराहट जगह बना रही है ...

-अंकित